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ये पुराना कर्ज है या दर्द? अनंत सिंह के जेल जाते ही 'अनंतमय' क्यों हो गए ललन सिंह

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Posted On:Tuesday, November 4, 2025

बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा सीट का चुनावी परिदृश्य दुलारचंद यादव हत्याकांड के बाद पूरी तरह बदल गया है। जेडीयू प्रत्याशी और बाहुबली नेता अनंत सिंह के चुनाव के बीच जेल जाने के बाद, उनके प्रचार अभियान की कमान संभालने के लिए खुद केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह मैदान में उतर गए हैं। ललन सिंह ने इस लड़ाई को अपनी साख का सवाल बना लिया है और अनंत सिंह की गिरफ्तारी को सहानुभूति में बदलने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

ललन सिंह का भावनात्मक दांव: "अब हर व्यक्ति अनंत सिंह है"

दुलारचंद यादव हत्याकांड में नाम आने के बाद पूर्व विधायक अनंत सिंह को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है, जिससे उनका चुनाव प्रचार धीमा पड़ गया था। इसी कमी को दूर करने के लिए केंद्रीय मंत्री ललन सिंह मोकामा क्षेत्र में कैंप कर रहे हैं। अनंत सिंह के लिए वोट मांगते हुए ललन सिंह ने एक भावनात्मक अपील की: "अनंत बाबू बाहर थे, तब हमारी जिम्मेदारी कम थी, लेकिन अब जब वे जेल में हैं, तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। आज से मैंने मोकामा की कमान अपने हाथ में ले ली है। अब एक-एक व्यक्ति अनंत सिंह बनकर चुनाव लड़े।" ललन सिंह अपनी जनसभाओं में अनंत सिंह की गिरफ्तारी को एक 'षड्यंत्र' बता रहे हैं, ताकि मतदाताओं के बीच सहानुभूति पैदा हो सके।

2024 का कर्ज 2025 में अदा करने का मौका?

सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अनंत सिंह के लिए ललन सिंह को इतनी सक्रियता से क्यों उतरना पड़ा। इसका जवाब उनकी पुरानी राजनीतिक केमिस्ट्री और मुंगेर लोकसभा सीट से जुड़ा है।

2024 लोकसभा चुनाव में मदद: 2024 के लोकसभा चुनाव में जब ललन सिंह मुंगेर सीट से चुनाव लड़ रहे थे, तब आरजेडी से अशोक महतो की पत्नी कुमारी अनीता के खिलाफ उनकी सीट फंस गई थी। उस समय अनंत सिंह जेल से पैरोल पर बाहर आए और ललन सिंह को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, जबकि उनकी पत्नी नीलम देवी आरजेडी से विधायक थीं।

कर्ज उतारने का अवसर: अनंत सिंह के समर्थन से ललन सिंह को सियासी फायदा मिला था। राजनीतिक विश्लेषक इसे उसी 2024 के कर्ज को 2025 में अदा करने का दांव मान रहे हैं। ललन सिंह खुद सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि अनंत सिंह के जेल जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है।

मोकामा के बहाने मुंगेर का सियासी किला बचाना

ललन सिंह का मोकामा में उतरना केवल अनंत सिंह के प्रति आभार जताना नहीं है, बल्कि अपने मुंगेर लोकसभा क्षेत्र के सियासी किले को बचाए रखने का एक रणनीतिक दांव भी है। वीणा देवी से पुरानी अदावत: मोकामा में अनंत सिंह के खिलाफ आरजेडी से वीणा देवी मैदान में हैं, जो बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी हैं। सूरजभान सिंह और ललन सिंह की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है।

2014 लोकसभा की हार: 2014 के लोकसभा चुनाव में मुंगेर सीट पर ललन सिंह को वीणा देवी (तब एलजेपी उम्मीदवार) ने ही हराया था। ललन सिंह समझते हैं कि अगर मोकामा सीट पर वीणा देवी जीत जाती हैं, तो भविष्य में वह उनके खिलाफ और मजबूत होकर ताल ठोक सकती हैं।

इसलिए, ललन सिंह बनाम सूरजभान सिंह की यह पुरानी लड़ाई अब मोकामा विधानसभा सीट के बहाने लड़ी जा रही है। ललन सिंह इस चुनाव को जीतकर वीणा देवी से अपना हिसाब बराबर करना चाहते हैं।

भूमिहार राजनीति का केंद्र

दुलारचंद यादव हत्याकांड के बाद मोकामा की लड़ाई अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति में बदल गई थी। हालांकि, अनंत सिंह, सूरजभान सिंह और ललन सिंह तीनों भूमिहार जाति से आते हैं। मोकामा को 'भूमिहारों की राजधानी' कहा जाता है, इसलिए यह चुनाव उनके सियासी वर्चस्व की लड़ाई बन गया है।

मोकामा से जीतने वाला भूमिहार नेता राज्य की राजनीति और अपने समाज में एक अलग रुतबा हासिल करता है। ललन सिंह की सक्रियता यह सुनिश्चित करने के लिए है कि अनंत सिंह की गैर-मौजूदगी में सूरजभान सिंह अपना सियासी वर्चस्व कायम न कर पाएं। मोकामा की यह लड़ाई अब सिर्फ एक विधानसभा सीट की नहीं, बल्कि बिहार के दो दिग्गज भूमिहार नेताओं की साख और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुकी है।


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