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New labour code: बदल गए नियम, घट सकती है आपकी टेक-होम सैलरी? समझें नए लेबर कोड और पुराने PF कानून का पूरा नियम

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Posted On:Monday, December 8, 2025

भारत में श्रम सुधारों (Labour Reforms) को लागू करने के लिए 21 नवंबर को चार नए लेबर कोड्स प्रभावी हुए, जिन्होंने देश के सोशल सिक्योरिटी ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव किया है। विशेष रूप से, ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020’ ने ग्रेच्युटी एक्ट और ईएसआई (ESI) एक्ट जैसे पुराने कानूनों की जगह ले ली है। हालांकि, इस बड़े सुधार के बीच कर्मचारी भविष्य निधि (PF) के कैलकुलेशन को लेकर एक कानूनी उलझन फंस गई है, जिसने नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

नए कोड्स का व्यापक दायरा

नए सोशल सिक्योरिटी कोड का दायरा बहुत विस्तृत किया गया है।

  • विस्तार: इसमें अब गिग वर्कर्स (Gig Workers) और प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) को भी सोशल सिक्योरिटी के सुरक्षा घेरे में लाया गया है।

  • ग्रेच्युटी में आसानी: फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि को पाँच साल से घटाकर सिर्फ एक साल कर दिया गया है।

PF पर सस्पेंस: एक ही सैलरी, दो कैलकुलेशन

सबसे बड़ी उलझन ईपीएफ एक्ट, 1952 को लेकर है। उम्मीद थी कि सोशल सिक्योरिटी कोड इसे अपने भीतर समाहित कर लेगा, लेकिन पुराने कानून को आधिकारिक रूप से रद्द करने की अधिसूचना जारी नहीं हुई है।

इसका परिणाम यह है:

  1. ग्रेच्युटी और ईएसआई: इनके लिए वेतन की नई परिभाषा (50% बेसिक वेज नियम) लागू है।

  2. पीएफ (PF): इसका कैलकुलेशन अभी भी पुराने EPF एक्ट (सेक्शन 2(b)) के हिसाब से चल रहा है, जो ‘बेसिक वेजेज’ की बहुत ही सीमित परिभाषा मानता है (जिसमें HRA, बोनस, कमीशन शामिल नहीं होते)।

यह एक ऐसी विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है जहां एक ही कर्मचारी की सैलरी का गणित अलग-अलग बेनिफिट्स के लिए अलग-अलग तरीके से लगाया जा रहा है।


सैलरी स्लिप में बदलाव और 50% का नियम

इस उलझन की जड़ ‘कोड ऑन वेजेज, 2019’ का वह नियम है, जो वेतन संरचना (Salary Structure) को मौलिक रूप से बदलता है:

नया नियम: किसी भी कर्मचारी का बेसिक वेतन (Basic Pay) + महंगाई भत्ता (DA) + रिटेनिंग अलाउंस मिलकर कुल वेतन का कम से कम 50% होना चाहिए।

यदि ये घटक 50% से कम हैं, तो बाकी भत्तों (Allowances) को बेसिक वेज में जोड़कर इसे 50% तक लाना होगा।

कंपनियों और कर्मचारियों के सामने दोहरी चुनौती

  1. कर्मचारियों पर असर (Take-home Salary और Tax): अगर 50% के नियम को पूरा करने के लिए कंपनियों को भत्तों (जैसे HRA, LTA) को बेसिक सैलरी में मिलाना पड़ता है, तो कर्मचारी HRA और LTA के माध्यम से मिलने वाली टैक्स बचत खो सकते हैं। इससे उनका इनकम टैक्स बढ़ जाएगा और हाथ में आने वाली सैलरी (Take-home salary) कम हो सकती है।

  2. नियोक्ताओं पर जटिलता: कंपनियों के सामने धर्मसंकट है— ग्रेच्युटी और ईएसआई के लिए 50% नियम मानें, लेकिन पीएफ के लिए अभी भी पुराना सीमित नियम प्रभावी है।

इससे निपटने के लिए कई कंपनियाँ अब दोहरी अकाउंटिंग का रास्ता अपना रही हैं। वे सैलरी स्लिप में भत्तों को बरकरार रख रही हैं (टैक्स बचाने के लिए), लेकिन पीएफ के कैलकुलेशन के लिए वे आंतरिक रूप से भत्तों को जोड़कर ‘नोशनल’ (Notional) वेतन मान रही हैं। इसका मतलब है कि पेरोल टीम को अब एक खाता टैक्स के लिए और दूसरा पीएफ कंप्लायंस के लिए मेंटेन करना पड़ेगा। यह कानूनी स्थिति स्पष्ट होने तक पेरोल प्रबंधन को जटिल बनाएगा।


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